Sunday, January 8, 2012

वो


मेरे पूछने पर इन्कार नहीं कर पाते हैं वो,
खुद मुहब्बत का इज़हार नहीं कर पाते हैं वो !

मैं खुश हूँ उनसे ख्वाबों-ख्यालों में मिलकर,
लेकिन कभी मेरा दीदार नहीं कर पाते हैं वो !

यूँ नहीं की मुहब्बत से ऐतराज़ है उन्हें,
मगर फ़िर मुझसे प्यार नहीं कर पाते हैं वो !

सोचा था हाल-ए-दिल कहेंगे उनसे मिलकर,
मेरे इरादों पर ऐतबार नहीं कर पाते हैं वो !

"साबिर" क्या कहूँ उनके रूठने का सबब,
मुझसे कभी तकरार नहीं कर पाते हैं वो !

Wednesday, December 14, 2011

कफ़न पे सेहरा


ख़्वाब सुनहरा है मेरा,
ज़ख्म भी गहरा है मेरा !

कैद है बस तेरी यादें,
और दिल पे पहरा है मेरा !

जनाज़े में यूँ तेरा आना,
जैसे कफ़न पे सेहरा है मेरा !

अब और तुझे लुभाऊँ कैसे,
बदसूरत ये चेहरा है मेरा !

क्या करूँगा मैं चल कर,
वक़्त भी ठहरा है मेरा !

हाल-ए-दिल सुनाता मगर,
दिलबर भी बहरा है मेरा !

Saturday, December 3, 2011

उलझनें


उसे उलझनें देकर,
मैं बस निहारता रहा, एक तक.....
क्यूँकी वो और भी मासूम
और हसीन नज़र आ रही थी,
जब वो सुलझा रही थी,
उन उलझनों को.......
जी किया एक बार कि
ख़त्म कर दूँ तमाम उलझनों को......
मगर हिम्मत ना कर पाया,
मैं दख़ल देने की....
कौन जाने फ़िर कब
ऐसा नज़ारा नसीब होता......
मगर फ़िर जब उसने इशारे से,
मदद की गुहार की.........
जाने कब मैंने ख़ुद ही ख़त्म कर दिया
सारी उलझनों और मुश्किलों को......
और जब वो धीरे से मुस्कुराई,
उसके रुख़ का सुकूँ, कोई नूर बन गया था......
मैं बस इबादत करता रहा.......
"साबिर", मैं जीना सीख रहा हूँ.......
शायद उलझनें जीना सहल कर देती हैं..........

Saturday, November 19, 2011

जीना इसी का नाम है........


जीना इसी का नाम है........

ग़म में मुस्कुराना.......
ख़ुशी में आँसू बहाना......
बड़ा ही मुश्किल काम है.......
जीना इसी का नाम है........

अपनी बरबादियों का जश्न मनाना......
ढूंढना जीने का कोई बहाना.......
बड़ा ही मुश्किल काम है.......
जीना इसी का नाम है........

अपने जीते-जी मर जाना.......
अपनी ही कब्र पे फूल चढ़ाना.......
बड़ा ही मुश्किल काम है.......
जीना इसी का नाम है........

दिल में दर्द आँखों में ख़ुशी दिखाना.....
खुद ही से अपने ग़मों को छिपाना.......
बड़ा ही मुश्किल काम है
जीना इसी का नाम है........

Sunday, October 2, 2011

कहकशाँ


क़ामयाबी की कहकशाँ में रहने दो,
ग़र मुझे इस गुमाँ में रहने दो !

परिंदा हूँ, ऊँची उडाँ है मेरी,
तुम मुझे आसमाँ में रहने दो !

तमाम मंज़िलें हो जाएँगी हासिल,
अपने सायों को कारवाँ में रहने दो !

ऊब चुका है दिल गुलों की ख़ुशबू से,
इन काँटों को गुलिस्ताँ में रहने दो !

"साबिर" तुम्हारी वफ़ा का अंदाज़ न भाया,
मेरी रक़ीब को आश्याँ में रहने दो !

Saturday, March 26, 2011

बुरी सूरत

उसकी ज़रुरत से मात खा गए,
"साबिर" बुरी सूरत से मात खा गए !

लहज़ा शायराना, अंदाज़ आशिकाना,
मगर महूरत से मात खा गए !

मुहब्बत, इबादात, फरियादें और मिन्नतें,
पत्थर की मूरत से मात खा गए !!

Sunday, February 13, 2011

अंगूर खट्टे हैं


मुहब्बत के इज़हार से डरता हूँ,
मैं उसके इक़रार से डरता हूँ !

छूटता नहीं इन काँटों का दामन,
मगर फूलों की बहार से डरता हूँ !

इनायत से बढ़कर है बेरुखी भी,
पर अब उसके प्यार से डरता हूँ !

ख़्वाबों में संजोकर उस फ़रिश्ते का अक्स,
आखिर क्यूँ मैं दीदार से डरता हूँ !

बस यूँ ही चलता रहे ये खुशनुमा सफ़र,
बेबस मुहब्बत के क़रार से डरता हूँ !

लगता है "साबिर" अंगूर खट्टे हैं,
मैं तो यूँ ही बेकार में डरता हूँ !

Sunday, December 5, 2010

जलवा


जल रहा हूँ मैं, सुलग रहा हूँ मैं,
आईने में अजनबी सा लग रहा हूँ मैं !

ख़याल तेरा आया तो ख़्वाब से की तौबा,
क्यूँ बेसबब यूँ रात भर से जग रहा हूँ मैं !

साया है ये तेरा, या फिर है तेरी आह्ट,
बेज़ा किसी तकल्लुफ से ठग रहा हूँ मैं !

चाँद ग़ज़लें न लिखी जो तेरी आरज़ू में,
'मीर', 'ग़ालिब', 'दाग' से क्यूँ अलग रहा हूँ में !

जलवा है ये "साबिर", अपनी ही आस्तीं में,
हूँ साँप बनके बैठा, क्या लग रहा हूँ मैं !!!

Wednesday, November 3, 2010

The pleasure is all mine !!!

There is always a better way,
But this is what I had to say,

Just your presence,
Makes the whole difference,

With all odds to cope,
Your thoughts are the hope,

So to make it fair,
Just be their,

In my dream and thought,
Thank God for what I got !!

Friday, September 24, 2010

राजदां

सुबह भूल गए थे ज़रा मंदिर जाना,
चलो अब उसी की उपासना हो जाए !

बस अब देर है उसके हाँ करने की,
मेरी ज़मीन मेरा आसमाँ हो जाए !

खुदा करे जो करम तो कुछ ऐसा करे,
उसकी निगाहों में मेरा आशियाँ हो जाए !

मेरी मुहब्बत का असर हो इबादत की तरह,
उसे खुद खुदा होने का गुमाँ हो जाए !

अपने जज़्बात पिरोता हूँ इन अल्फाजों में,
उसके दिल में मेरा नाम-ओ-निशाँ हो जाए !

मज़ा तो जब है की मुहब्बत हो दोनों तरफ,
मैं परवाना और वो मेरी शम्मा हो जाए !

दूरियां बढ़ा देती हैं मुहब्बत का असर,
फासले कुछ तेरे मेरे दरमियाँ हो जाए !

उसकी मुहब्बत मांगती है शहादत मेरी,
आओ मुहब्बात में अब फ़ना हो जाए !

हाल-ए-दिल का बयाँ सब से करें तो करें कैसे,
आओ "साबिर" खुद ही के राजदां हो जाए !!!