Sunday, May 30, 2010

उसके बिना

उसके बिना अब कोई ख़ुशी भी मुमकिन नहीं,
मगर "साबिर" खुदकुशी भी मुमकिन नहीं !

मुद्दत हुई दिल खोल कर रोये थे कभी,
लेकिन अबी चेहरे पे हंसी भी मुमकिन नहीं !

मुनासिब है सजदा, बंदगी और इबादत भी,
उस फ़रिश्ते से आशिकी भी मुमकिन नहीं !

सोचा था उसे अपना हाल-ए-दिल सुनायेंगे,
मगर अंदाज़ में वो बेबसी भी मुमकिन नहीं !

समा गया है वो जिस्म में रूह की तरह,
उसके बिना अब तो ज़िन्दगी भी मुमकिन नहीं !

उस अहसास को भुला देने की खुशफ़हमी,
अफ़सोस खुद से ये दिल्लगी भी मुमकिन नहीं !

हिम्मत नहीं की उसके ऐतराज़ की वजह समझें,
तमाम कोशिशें ये आखिरी भी मुमकिन नहीं !

क्या करोगे "साबिर", उस अहसास को भुलाकर ?
बिना दर्द के तो शायरी भी मुमकिन नहीं !!

6 comments:

  1. Jism ki chot se to aankh sajal hoti hai...
    aur rooh jab gham se karaahe to ghazal hoti hai!

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  2. tumhare dil ki kahani .......... dard aur dard mein chuppa pyaar... bahut acha likha hai

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