Tuesday, October 20, 2009

अक्स

हर जज़्बात निभाते उसे देखा है मैंने,
उसे खुद से छुपाते देखा है मैंने,

है कुछ ख्वाहिशें ऐसी की ये दिल मचल जाये,
और बे-आरजू उसे मचलते देखा है मैंने

संभलना मुश्किल है यूँ तो ठोकर खाकर,
बिना ठोकर के संभलते उसे देखा है मैंने

नहीं आसान निभा पाना दोस्ती ता-उम्र औरों से,
खुद से रंजिश ता-उम्र निभाते उसे देखा है मैंने

अहसान-फरामोश हो जाते हैं यहाँ लोग औरों से,
और खुद का ही अहसानमंद होते उसे देखा है मैंने

न जाने किस शख्स का ज़िक्र कर रहे हो "साबिर" ?
के आज आईने में अपना ही अक्स देखा है मैंने

3 comments:

  1. mera bhi yahi manna hai mohtarma :)

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  2. Magical lines and unmatched thoughts!
    Portrayal is really beautiful! Hats Off

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  3. thanks a lot for such nice words !!!

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