Sunday, January 17, 2010

इज़हार-ए-इश्क

इज़हार--इश्क में शर्मिन्दगी कैसी,
"साबिर" उसके बिना ज़िन्दगी कैसी ?

दिल में तमन्ना है उसके सजदे की,
अब किसी और की बंदगी कैसी ?

उसका मिलना सहल(1) है ख्वाबों में,
फिर मुलाक़ात की तश्नगी(2) कैसी ?

बिना जाने उसे अपना बना बैठे,
ये अजब
सी दीवानगी कैसी ?

इनकार को मैं उसके, इकरार में बदल दूं,
मकबूल(3) ज़िन्दगी की नुमाइंदगी(4) कैसी ?

समझा
नहीं कभी औरों की मुहब्बत को,
"
साबिर", दिल की लगी, दिल्लगी(5) कैसी ?

1. सहल = आसान 2. तश्नगी = प्यास
3.
मकबूल = सर्वप्रिय, हर दिल अज़ीज़
4.
नुमाइंदगी = प्रतिनिधित्व 5.
दिल्लगी = मज़ाक

5 comments:

  1. Bahut hi shandaar yaar...khaskaar pehla aur akhiri sher...bahut hi jandaar...

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  2. Aap sabhi ka bahut bahut shukriya !!!!

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