Wednesday, December 14, 2011

कफ़न पे सेहरा


ख़्वाब सुनहरा है मेरा,
ज़ख्म भी गहरा है मेरा !

कैद है बस तेरी यादें,
और दिल पे पहरा है मेरा !

जनाज़े में यूँ तेरा आना,
जैसे कफ़न पे सेहरा है मेरा !

अब और तुझे लुभाऊँ कैसे,
बदसूरत ये चेहरा है मेरा !

क्या करूँगा मैं चल कर,
वक़्त भी ठहरा है मेरा !

हाल-ए-दिल सुनाता मगर,
दिलबर भी बहरा है मेरा !

6 comments:

  1. बहुत निकले मेरे दिल के अरमां मगर फिर भी कम निकले ...

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